अद्वैत के बाद द्वैत कहाँ?
एक बार जब सिद्ध हो गया कि ये स्थूल दिखने वाला जगत वास्तव में सूक्ष्म ही है, और ये सूक्ष्म अनुभूत होने वाला जगत प्रकाश ही है और ये प्रकाश ही सूक्ष्म और फिर स्थूल बन बैठा है।
अद्वैत के बाद द्वैत कहाँ?
एक बार जब सिद्ध हो गया कि ये स्थूल दिखने वाला जगत वास्तव में सूक्ष्म ही है, और ये सूक्ष्म अनुभूत होने वाला जगत प्रकाश ही है और ये प्रकाश ही सूक्ष्म और फिर स्थूल बन बैठा है।
ज्ञान के बाद समर्पण/सेवक भाव
सौभाग्य से सद्गुरु मिले, वार्ता हुई, वार्ता के बाद फिर वार्ता हुई। श्रवण, मनन, निदिध्यासन हुआ, प्रश्न उत्तर हुआ। कई प्रश्नों के उत्तर मिले। समाधान हुआ। अध्यात्म की नयी परिभाषा मिली।
अज्ञानी का उल्टा (विपरीत) ज्ञान
अज्ञानी को सदैव विपरीत आभास होता है। वो जगत को ही सत्य समझता है। इसी को स्थायी समझता है। इसी के कारण उसका सारा एकत्र किया हुआ ज्ञान उल्टा अर्थात विपरीत ज्ञान है, अर्थात अज्ञान है। इसीलिए वो अज्ञानी है।
आज कुछ विशेष मनन करते हैं।
आध्यात्मिक जीवन में एक ही लक्ष्य है स्वयं का, आत्मन का अध्ययन, आत्मन अथवा साक्षी भाव में स्थित होकर ही हम आनंद में रहते हैं। मूलतः यही हमारा विश्राम स्थल है। हमारा होम टाउन है।
श्रीमद्भगवतगीता में, श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं..
"जिनका अज्ञान वो सारा, मिटा है आत्म ज्ञान से।
उनका वो सूर्य सा ज्ञान, प्रकाशे है ब्रम्ह रूप को ॥" (५/१६)
सद्गुरु आश्वासन एवं ज्ञान अधिकारी अनाधिकारी:
आइए आज श्रीमद्भगवतगीता के कुछ श्लोकों का आनंद लेते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण अस्तित्व / ब्रम्ह भाव में स्थित हैं। इसलिए वो विश्वं विष्णु एवं विश्वरूप सद्गुरु हैं।
गतांक से आगे... व्यष्टि, समष्टि और परमेष्टि अब इतने शुद्ध और श्रेष्ठ विचारों, सूत्रों, श्लोकों की श्रंखला कहाँ से आयी? इसका आधार क्या है? च...