चैतन्य ही संसार है..
साक्षी है, आत्मन है, चैतन्य है, सर्वत्र है.. तो क्या उसके सिवा कुछ और हो सकता है? अगर दृष्टा है, सर्व समर्थ है, तो आनंद में ही स्वयं में चित्त शक्ति द्वारा दृश्य दृष्टि प्रकट कर लिया... और इस खेल का, इस लीला का, इस कौतुक का आनंद ले रहा है, वो भी बिना कुछ किए।