बिनु पद चले, सुने बिनु काना....
(अनुभवकर्ता के कोई अपने पैर नही है फिर भी वो चलने का अनुभव करता है..)
सब अस्तित्व है, सब अस्तित्व में है। दृष्टा दृश्य सब इसी में है। ईश है तो उसका ऐश्वर्य भी उसी में है। प्रभु है तो उसका प्रभुत्व भी उसी में है।
बिनु पद चले, सुने बिनु काना....
(अनुभवकर्ता के कोई अपने पैर नही है फिर भी वो चलने का अनुभव करता है..)
सब अस्तित्व है, सब अस्तित्व में है। दृष्टा दृश्य सब इसी में है। ईश है तो उसका ऐश्वर्य भी उसी में है। प्रभु है तो उसका प्रभुत्व भी उसी में है।
गतांक से आगे... व्यष्टि, समष्टि और परमेष्टि अब इतने शुद्ध और श्रेष्ठ विचारों, सूत्रों, श्लोकों की श्रंखला कहाँ से आयी? इसका आधार क्या है? च...