अखण्ड मंडलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम....
गुरु वंदना की ये पहली पंक्ति है। अद्भुत है।
इसमें उस अस्तित्व का वर्णन हो गया, उसको नाम कोई भी दे दो। वो तत्व वही रहेगा, वही मूल वस्तु है, जिसका साक्षात्कार गुरु की शरण में जाने से गुरु नें करवा दिया। गुरु स्वयं उसका साक्षात्कार कर चुका है। गुरु स्वयं उस भाव में स्थित है। अनुभवक्रिया में। कोई विश्वरूप परमात्मा, कोई विश्वरूप हरि, कोई शिव-शक्ति, कोई विश्वं विष्णु, विश्व चित्त इत्यादि कुछ भी कह दो अस्तित्व वही रहेगा।